जैसी आस्था वैसा भविष्य


हिन्दू धर्म के सेक्युलर होने से अब आस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह ???


हमारी परंपरा और संस्कृति के आधार पर आज बहुत सारे घटक इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारे भूत, भविष्य 
और वर्तमान हमारे विश्वास और कर्म से प्रभावित होते हैं। प्रत्येक मनुष्य की धारणाएं भिन्न भिन्न होती है और मंजिल 
को प्राप्त करने के प्रयास के विकल्प भी भिन्न भिन्न होते हैं जिसका प्रभाव वर्तमान में तो नहीं अपितु भविष्य में अवश्य दिखता है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग से समस्त मानव का कल्याण होता आया है और जिन लोगों ने इन तीन अवयवों में से किसी एक को भी छोड़ दिया तो सम्पूर्ण जीवन अनियंत्रित होने लगता है, जिसके कारण 
घर, परिवार और वातावरण में दुष्प्रभाव आता है। जो संस्कार हमने अपने पूर्वजों से पाए हैं वही हम अपनी पीढ़ी 
को भी देते हैं।  यद्यपि हमारा भारत एक अति प्राचीन देश है और सम्पूर्ण विश्व में यह एकलौता हिन्दू राष्ट्र है। 

यहाँ सतियुग के प्रमाण  मिल जायेंगे, त्रेता युग में जन्मे भगवान "नारायण"  के अवतार "श्रीराम" के मर्यादा पुषोत्तम होने की अनेको  जानकारी मिल जाएगी जाएगी और द्वापर में  भगवान "विष्णु" के अवतार " श्री किष्ण" का सम्पूर्ण विवरण  प्राप्त हो जायेगा, परन्तु जो नास्तिक हैं वो सिर्फ स्वयं को मानते हैं उनको किसी के धर्म और आस्था  से कोई मतलब नहीं होता और फलस्वरूप वो अपनी इच्छापूर्ति के लिए कई ऐसे व्यक्तियों का साथ पकड़ लेता है जो या बाहरी देश के निवासी होते हैं या फिर कोई अन्य धर्म के अनुयाई ! 

1947 में हमारा देश आजाद हुआ और तब तक नए दौर के निर्माण के लिए हमारे देश के विभिन्न पदों में कार्यरत लोगों ने विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ हाथ मिलाया और आज आप और हम यह देख सकते हैं की बहुसंख्यक श्रेणी में आने वाला हिन्दू अब बहुसंख्यक नहीं बल्कि अल्पसंख्यक बन चुका है और इसका कारण है "लगातार हो रहे धर्म परिवर्तन।  जब धर्म बदल गया तो स्वभाविक है कि मानसिक दृष्टिकोण के साथ साथ व्यक्ति का कर्म भी बदलेगा ! और देखते ही देखते व्यक्ति स्वयं ही बदल जायेगा।  उसके बदल जाने की वजह से परिवार में संस्कार भी बदल जायेंगे 
 
 

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